What is the motivation of my shayaris??
i can answer this way:
रोशनी देना केवल सूरज का काम नहीं,
कभी-कभी दिए भी रस्ते दिखा दिया करते है |
--- लम्हा (Lamha)
Thursday, October 29, 2009
first ghazal
After some improvement and lots of thinking i am writing my first ghazal or can say continuous shayari. I hope this makes sense to every reader:
मेरा दिल लिए जा रहे हो, बोलो संभाल पाओगे,
जिस दिन मेरी सांस टूटी, उस दिन तो मिलने आओगे |
ऐसे न रोंदो वोह दिल है दिल, ज़माना भी दुहाई देगा
क़यामत के दिन ये दिल ही तेरे लिए गवाही देगा |
जितनी भी तुम कोशिश कर लो, हमें नहीं भुला पाओगे,
जब भी ढूंढोगे तो दिल ही नहीं, हमें भी अपने पास पाओगे |
दुनिया की हर ख़ुशी मिले, यह दुआ दूँगा,
एक अश्क भी गिरा तेरा तो रब से भी बैर लूँगा |
तुम साथ न हो हर लम्हा यही एक गम होगा,
हम दुआ करेंगे यह जमाना तुम पर न इस तरह बेरहम होगा ||
--- लम्हा (Lamha)
मेरा दिल लिए जा रहे हो, बोलो संभाल पाओगे,
जिस दिन मेरी सांस टूटी, उस दिन तो मिलने आओगे |
ऐसे न रोंदो वोह दिल है दिल, ज़माना भी दुहाई देगा
क़यामत के दिन ये दिल ही तेरे लिए गवाही देगा |
जितनी भी तुम कोशिश कर लो, हमें नहीं भुला पाओगे,
जब भी ढूंढोगे तो दिल ही नहीं, हमें भी अपने पास पाओगे |
दुनिया की हर ख़ुशी मिले, यह दुआ दूँगा,
एक अश्क भी गिरा तेरा तो रब से भी बैर लूँगा |
तुम साथ न हो हर लम्हा यही एक गम होगा,
हम दुआ करेंगे यह जमाना तुम पर न इस तरह बेरहम होगा ||
--- लम्हा (Lamha)
Tuesday, October 27, 2009
Dedicated to friends
These are a few which i wrote because of people's initial commnets/feedback:
शायर तो हम हमेशा से थे,
पर इस दुनियादारी की भाग-दौड़ में हम खुद को ही भुला बैठे |
हमें न निकालो उनके ख्यालों से बाहर,
कुछ तो रहने दो जीने के लिए, हमारी सांस तो कब की बंद है |
this one is dedicated to my batch-mates cum colleagues, my good friends:
तुम्हारा साथ था तो हस्ते हुए ऊंचाईयां छूते चले गए,
जब से तुम गए तब से ये रस्ते भी बेगाने लगते है |
--- लम्हा (Lamha)
शायर तो हम हमेशा से थे,
पर इस दुनियादारी की भाग-दौड़ में हम खुद को ही भुला बैठे |
हमें न निकालो उनके ख्यालों से बाहर,
कुछ तो रहने दो जीने के लिए, हमारी सांस तो कब की बंद है |
this one is dedicated to my batch-mates cum colleagues, my good friends:
तुम्हारा साथ था तो हस्ते हुए ऊंचाईयां छूते चले गए,
जब से तुम गए तब से ये रस्ते भी बेगाने लगते है |
--- लम्हा (Lamha)
Sunday, October 25, 2009
My first notations of shayari
After watching the old tv serial on Mirza Ghalib the shayar in me has awaken who used to make small shayaris from all the small moments of life. Today i wrote three small shayaris and wish to know your comments to improve further:
सालों इंतज़ार के बाद उनका एक पैगाम आया...
समझ नहीं आता, पैगाम देख कर खुश हो या तारीख देख कर |
हम तो तन्हा ही आये थे और तन्हा ही चले जायेंगे,
अए ज़माने, तू उनको बेवफा न कहना |
अगर कोई हमसफ़र मिल जाये तो मीलों चले जाएँ...
अकेले में तो राह का हर पेड़ मील का पत्थर लगता है |
--- लम्हा (Lamha)
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